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क्या ‘पीएम केयर्स’ फंड ने भाजपा को गुजरात और बिहार चुनाव के लिए आत्मनिर्भर बना दिया है?

क्या ‘पीएम केयर्स’ ने भाजपा को आत्मनिर्भर बना दिया है?

क्या अब बिहार और गुजरात चुनावों के लिए बड़े धन्नासेठों पर निर्भर नहीं रही बीजेपी?

पिछले दो महीने से सवाल पूछा जा रहा था कि कोरोना से लड़ने के नाम पर देशवासियों ने जो हज़ारों करोड़ रुपये ‘पीएम केयर्स फंड’ में जमा किये, उसका क्या हुआ?

सही बात है कि इस कठिन दौर में देश के लिए ये सबसे बड़ा सवाल होना भी चाहिए। फिर भी सरकार ने इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। अलग अलग मौकों पर पीएमओ से भी आरटीआई डालकर पूछा गया तो हर बार जानकारी गोपनीय रखी गयी। हैरत तो तब और हुई जब ये कह दिया गया कि ‘पीएम केयर्स फंड’ कोई पब्लिक ऑथोरिटी है ही नहीं। एसबीआई से ‘पीएम केयर्स फंड’ पर पूछा गया तो वहाँ भी ये कहकर जवाब देने से इनकार कर दिया गया कि ये जानकारी निजी है।

सब सर पीटते रहे लेकिन संवेदनहीन मोदी सरकार पर इस आपात स्थिति में भी इन सवालों का कोई असर नहीं पड़ा। शायद अहंकार और सत्ता का नशा इस कदर सर चढ़ गया है कि देश का बेड़ागर्क करके शर्म आना दूर, ये लोग अब सवालों के जवाब देना भी ज़रूरी नहीं समझते।

लेकिन पिछले कुछ दिनों की गतिविधियों से मामला साफ होने लगा है। कुछ लोग पहले भी कह रहे थे कि इस संदिग्ध गोपनीयता का एक ही मतलब है कि पैसे का कोई ऐसा इस्तेमाल होगा जो देश को बताया नहीं जा सकता।

अब जब आप गुजरात में चल रही विधायकों की राजनीतिक उठा पटक और दल बदल देख रहे होंगे या बिहार में बेतहाशा खर्च पर चल रही ‘वर्चुअल रैली’ तो आपको जवाब मिल गया होगा।

गुजरात में राज्यसभा सीट के चुनाव से पहले 9 कांग्रेस विधायकों ने दल बदलकर भाजपा जॉइन कर लिया है। खरीद फ़रोख़्त रोकने के लिए कांग्रेस ने बाकी बचे विधायकों को रिसॉर्ट में शिफ्ट कर दिया है। मतलब कि एक तरफ तो गुजरात की कोरोना से हालत खराब है, अहमदाबाद की स्थिति तो दिल्ली से भी बुरी है। लेकिन रिसॉर्ट पॉलिटिक्स और हॉर्स-ट्रेडिंग के आरोप ऐसे वक्त में भी लगने शुरू हो गए। देश में जब कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा इटली को पछाड़ गया और हर दिन हम पिछले रिकॉर्ड को तोड़ रहे हैं, तो भाजपा का ध्यान गुजरात की राज्यसभा सीट और बिहार के विधानसभा चुनाव पर ही है।

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बिहार में तो जितना खर्च अमित शाह की एक रैली में कर दिया गया, उतने में न जाने कितने प्रवासी मजदूर सुरक्षित घर पहुँच जाते। इस रैली की तैयारी में इन्होंने जितना बारीक ध्यान दिया है, उतना ध्यान अगर लॉकडाउन की तैयारी में देते तो कोरोना पर हम फेल नहीं होते। शर्म आना चाहिए शाह और शहंशाह को कि ऐसे वक्त में भी इनका ध्यान कोरोना नहीं, बिहार का चुनाव है।

अर्थव्यवस्था की बदहाली में उद्योग धंधों की जो हालत हुई है, उसमें बड़े बड़े पूंजीपति इन्हें कितना पैसा दे पाएंगे ये अब पता नहीं। तो क्या ‘पीएम केयर्स’ ने इस मुश्किल घड़ी में इन्हें आत्मनिर्भर बना दिया है? क्या अब बिहार और गुजरात चुनावों के लिए बड़े धन्नासेठों पर निर्भर नहीं रही बीजेपी?

उम्मीद है अब तो पूरे देश को जवाब मिल गया होगा। ये जवाब आरटीआई में कोई कैसे दे सकता था भाई। समझते हैं कि नहीं?

Written by Anupam

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